Monday, 10 October 2011

मेरी चिड़िया

दूर से आती, चहकती चिड़िया
देख के मुझको कुछ कह जाती 
रंग बिरंगी इठलाती चिड़िया 
याद हमेशा तुम्हारी दिलाती 

अलग-अलग है; रंग है उनका 
अलग-अलग है सुर उनका 
याद हमेशा मुझे दिलाती 
अलग-अलग वो यादें तुम्हारी 

कभी चहकती, कभी चुप रहती 
कभी उड़ के फिर, कही और जाती 
कभी तुम बोलती, कभी तुम हंसती 
कभी रूठ के तुम, मुझसे मनवाती  

तिनका-तिनका जोड़ के चिड़िया 
लगी हुई है घर बनाने 
जैसे यादों को पिरो कर 
सपनो का घर, चले हम बसाने 

आँखे नम हो जाती है जब 
यादें वो याद आतीं है तब 
उड़ान भर के अब आसमान में 
जाने कितनी दूर जाना है अब 

बस एक ही आस अब लगी है मन में 
कि उड़ते रहना अब तुम्हारे संग में
कि उड़ते रहना अब तुम्हारे संग में
                                                    .....तापस सूत्रधर 

Sunday, 9 October 2011

ना जाने कैसे ....

ना जाने क्यों, कब और कैसे 
पहुंच गये हम यहाँ, ना जाने कैसे 
ना कोई साथी, ना कोई सहारा 
हो गये लाचार हम, ना जाने कैसे 

ना जाने कैसे हम पहुचे यहाँ वैसे 
जहां सुनते हम भजन और अज़ान भी ऐसे 
ना जाने क्यों ये लगता है मुझको 
जैसे ज़न्नत में बसा कोई खुशकिस्मत खुद को 

सिगरेट बना चिलम 
और बेडरूम बनी क्लासरूम 
ना जाने क्यों फिर भी 
सुख हुआ नही बिलकुल भी कम 

ना जाने कैसे बीतता चला गया ये समय 
और समेट लाया साथ में यादें ढेर सारी
कुछ खट्टी, कुछ मीठी और कुछ कभी ना भुला पाने वाली 
ना जाने कैसे पहुच गये हम यहाँ 
जो लगती है, स्वर्ग की नगरी अभी 
                                                    .....तापस सूत्रधर